भारत पर फेंका EVM बम्ब

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भारत पर फेंका EVM बम्ब  

क्या आप जानते हैं कि 80 से 85% भारतीयों का भारत की संसद मे कोई प्रतिनिधि ही नही है?

बात बहुत अजीब सुनाई देती है मगर आइये, नीचे के 4 points मे देखें कि मामला कितना संगीन है.

  1. जनगणना

पहली समस्या है जनगणना की. भारत 1947 मे आज़ाद हुआ मगर किसी ने 59 साल तक जनगणना करवाने की सोची ही नही. 2006 मे आज़ाद भारत की पहली जनगणना हुई जिसमे  National Sample Survey Organisation (NSSO) ने निर्धारित किया कि भारत मे 41% अन्य पिछडी जातियों (OBC) के लोग हैं.

लेकिन मंडल कमीशन ने 1931 की अंग्रेज़ों की जनगणना के मुताबिक अन्य पिछडी जाति के लोगों की संख्या 52% बताई थी. मंडल कमीशन 1980 मे आया था. अगर ये भी मान लें कि 1931 के आंकडे 1980 मे बदले ही नही थे, यानि जनसंख्या बढी ही नही थी, तो फिर 2006 मे से ये संख्या 52% से घट कर 41% कैसे हो गई?

अर्थात 11% भारतीय, लगभग 12 से 14 करोड लोग , अचानक लुप्त हो कर कहां चले गये?

स्पष्ट है कि जनगणना के आंकडे सही नही हैं.

इन्ही सन्देहजनक आंकडो को ही अगर सच मान भी और आगे चलें तो 2006 मे भारत मे 24% दलित (SC, ST) थे. उस समय की कुल जनसंख्या 1 अरब 16 करोड बताई जाती है. यानि कि दलित लगभग 28 करोड थे.

आज 11 साल बाद उनकी जनसंख्या कितनी होगी? हम एक मोटा मोटा अन्दाज़ा लगाने की कोशिश करते हैं. अगर हम मान लें कि भारत मे हर साल लगभग 1 करोड 50 लाख व्यक्ति बढ रहे हैं तो 24 % दलित के हिसाब से हर साल लगभग 36 लाख दलित बढ रहे हैं. यानि कि 11 साल मे 40 करोड दलित बढ गये. अर्थात दलितों की कुल जनसंख्या 65 करोड के आस पास पहुंच गई जो कि आज की कुल जनसंख्या का लगभग 50% बनता दिखाई दे रहा है??

2006 मे जनगणना के बाद भारतीय संसद मे दलितों के लिये 24% सीटें (543 मे से 131) रिज़र्व की गईं. लेकिन उनकी संख्या पहले भी ज़्यादा थी, और अब और ज़्यादा हो चुकी है. लेकिन आज भी उनके लिये वही 24% सीटें ही रखी गई हैं.

70 साल मे इतनी बडी जनसंख्या के जीवन स्तर मे कोई तरक्की नही हुई. उनकी संख्या ‘दुगुनी‘ हो गई पर आज भी उन्हे आरक्षण की वैसी ही ज़रूरत है जैसी अंग्रेज़ों के समय मे थी.

  1. प्रतिनिधि नही शत्रु

दलितों के लिये आरक्षित इन 24 % सीटों पर, यानि 543 मे से 131 सीटों पर, कौन बैठा है? क्या ये सांसद दलितों का प्रतिनिधित्व करते हैं?

बिल्कुल नही.

इनमे से अधिकतर लोग भाजपा या कांग्रेस की टिकट पर जीत कर आये हैं. भाजपा और कांग्रेस सवर्णो की पार्टियां हैं. यानि उनकी टिकटों पर जीते दलित सांसदो का काम ही दलितों के मुद्दे पर मुन्ह बन्द रखना है. किसी के दल बदलने पर भी कोई रोक टोक नही है. तो इस प्रकार इन 131 सीटों का अर्थ ज़ीरो है. अम्बेदकर के शब्दों मे ये दलित सांसद, दलितों के प्रतिनिधि नही, उनके शत्रु हैं.

  1. अन्य पिछडी जातियां और अल्पसंख्यक

अगर 2006 के National Sample Survey Organisation की ही मान लें तो भारत मे 41% अन्य पिछडी जातियां हैं. इनके लिये कोई सीटें आरक्षित नही हैं. इनकी आर्थिक और सामाजिक हालत दलितों से बस थोडी ही बेहतर है. इसलिये इनके ईमानदार प्रतिनिधियों का चुनाव जीत कर संसद तक पहुंचना भी आसान नही . कुछ ऐसी ही दशा अल्पसंख्यकों की है, जिनकी संख्या लगभग 20% बताई जाती है. इनमे से ऐंग्लो इंडियन लोगों के लिये 2 सीटें आरक्षित हैं.

ऊपर के इन तीन points से साफ है कि सरकार चाहे जो दावे करे,  41% OBC + 20% अल्पसंख्यक + 24% दलित = 85 % भारतीयों को संसद की 543 मे से 131+ 2 सीटें मिलती हैं. यानि 85% को 24% सीटें.

वो भी जिन पर प्रतिनिधि नही, शत्रु काबिज़ है.

तो जिस देश की जनसंख्या का ही पता नही, जहां करोडों लोग सिरे से गायब हो सकते हैं और किसी को भ्रम तक नही होता, जिसकी संसद मे लगभग 80-85% लोगों का प्रतिनिधित्व ही नही, वो देश क्या कभी उन्नति कर सकता है?

ये 85% भारत सोया हुआ नही है. भारत की सारी लडाई, सारा आन्दोलन, सारी ताकत इसी भारत की है, जो अधिकतर ग्रामीण है. लेकिन इसकी आवाज़ शहरी भारत तक पहुंचती नही, जो अपनी ही समस्याओं मे उलझा है.

समय समय पर भारत की ऊंची उठती चीख को दबाने के ठोस और बेहद कारगर उपाय किये जाते है.

  1. Electronic Voting Machine (EVM)

आइये अब देखते हैं कि ऊपर की सूचना से ईवीएम का क्या सम्बन्ध है.

जयप्रकाश नारायण, विश्वनाथ प्रताप सिन्ह और कांशीराम जैसे लोगों के प्रयत्नो से 85% भारत बहुजन के रूप मे  संगठित होने लगा. इस संगठन को  दबाने के इंतज़ाम भी जल्द ही किये गये.

1972 मे बामसेफ का उदय हुआ. तुरंत 1975 से 1977 तक आपातकाल लगाया गया ताकि बहुजनो मे पैदा हुई चेतना को दबाया जा सके.

1984 मे बहुजन समाज पार्टी का निर्माण हुआ. तुरंत 1989 मे ‘People representative act 1951‘ को बदल कर EVM को बैलट पेपर का विकल्प बनाने की बात लाई गई.

इस समय तक बाकी दुनिया वोटिंग मशीन को धिक्कार चुकी थी.

लेकिन भारत मे इस मशीन को ऐसे स्थापित कर दिया गया जैसे आज तक की सबसे बडी उपलब्धि ये मशीन ही हो.

2004, 2009, 2014 मे वोटिंग मशीन के प्रयोग से यूपीए 1, यूपीए 2 और भाजपा जीतीं.(यूपीए के विरोधी कैसे इतने बडे, पूर्ण बहुमत से जीत गये, जिस तरह का पैसा चुनाव मे खर्च हुआ, ये अपने आप मे बहुत षडयंत्रकारी बात है.)

और नोट करने की बात ये है कि 2014 और 2017 मे बहुजन समाज पार्टी की सीटों का पूर्ण सफाया हो गया.

इसी प्रकार तेज़ी से उभरती आम आदमी पार्टी को भी पंजाब और गोआ मे दबा दिया गया.

तो भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन का अंत वोटिंग मशीन से हो गया है.

जब तक ये मशीन रहेगी, केन्द्र मे 85% भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार नही आ सकती.

यानि ऐसी सरकारी नीतियां नही बन सकतीं कि जनता के टैक्स का बडा हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, किसानो, जवानो, बिजली, पानी आदि पर खर्च हो.

अब समझ मे आ रहा है कि भारत मे सिर्फ 3% लोग ही आयकर क्यों देते हैं. 97% भारतीयों की आय ही नही तो वे आयकर कैसे देंगे? उनपर बेतहाशा छिपे हुए टैक्स ठोंके जाते हैं. सोचिये ज़रा, अगर 100 % भारतीय आयकर देने के काबिल हो जाएं, तो देश कहां से कहां पहुंच सकता है.

जापान एटम बम्ब की मार झेल कर भी खडा हो गया. जरमनी विश्वयुद्ध के असर मे डूब कर भी उबर गया. अमरीका, जिसका 1 डालर 1 रुपया था, दुनिया का नम्बर 1 देश बन गया.

लेकिन भारत? हम 70 साल मे गरीब से गरीबतर हुए हैं क्योंकि हम पर एटम बम्ब नही, EVM बम फेंक दिया गया है.

https://politicalbaaba.wordpress.com/key-political-parties-2/bahujan-samaj-party-bsp/

https://www.youtube.com/watch?time_continue=1&v=FbqH4fkCZw4

https://ban-the-evm.blogspot.ch/2017/06/principles-of-genuine-elections-fatal-threat-evm.html?m=1

 

 



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