रोज के काम में LG पैदा नहीं कर सकते अड़चन : SC

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केंद्र बनाम दिल्ली सरकार के मामले की तीसरे दिन सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच में चीफ जस्टिस ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एलजी रोजाना के कामकाज में अवरोध नहीं पैदा कर सकते। किसी भी नीतिगत मामले में एलजी की राय अलग हो सकती है। यानी नीतिगत मामले में एलजी असहमति जता सकते हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है कि असहमति सिर्फ असहमति के लिए नहीं हो सकती।

तीसरे दिन जब सुनवाई शुरू हुई तो दिल्ली सरकार के वकील गोपाल सुब्रह्मण्यम ने पहले कहा कि अनुच्छेद-239 एए के तहत दिल्ली के लिए विशेष प्रावधान किया गया है। अनुच्छेद के अपवाद के तहत एलजी असहमति की स्थिति में किसी भी मामले को राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं। हालांकि अपवाद नियम नहीं हो सकता और मुख्य प्रावधान को खत्म नहीं कर सकता। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि रोजाना के कामकाज में एलजी का दखल नहीं हो सकती। मतभेद के लिए मतभेद नहीं हो सकता। साथ ही कहा कि एलजी को जो भी जिम्मेदारी दी गई है, वह संपूर्ण नहीं हो सकती। एलजी हर मामले में नकारात्मक राय नहीं ले सकते। अगर किसी मामले में असहमति है तो एलजी मामले को राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं। एलजी का जो प्रशासनिक काम है, वह संवैधानिक दायरे में है।

दिल्ली सरकार के मंत्रीपरिषद के सलाह वैक्यूम में नहीं रह सकती। चीफ जस्टिस ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर दिल्ली सरकार ने 2 हजार नाइट शेल्टर बनाने के मामले में फैसला लिया हो और मामले को एलजी के पास भेजा हो तो एलजी कह सकते हैं कि 500 नाइट शेल्टर का काम शुरू कर सकते हैं। बाकी 1500 के लिए वह मामले को राष्ट्रपति के पास भेज रहे हैं। इस तरह एलजी काम कर सकते हैं, लेकिन सिर्फ दखल के लिए दखल नहीं दिया जा सकता।

गोपाल सुब्रह्मण्यम ने कहा कि मंत्री परिषद की सलाह एलजी के लिए बाध्यकारी है वरना सलाह का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा। तब चीफ जस्टिस ने कहा कि नीतिगत मामले में एलजी के पास अधिकार है कि वह मतभेद की स्थिति में मामले को राष्ट्रपति के पास भेजें। एलजी के लिए नीतिगत मामले में मंत्रीपरिषद की सिफारिश मानना बाध्यकारी नहीं है। आप (दिल्ली सरकार) अन्य राज्यों की बात कर रहे हैं, जहां राज्यपाल को सलाह मानना बाध्यकारी है। दिल्ली में नीतिगत मामले में एलजी को अधिकार है यानी नीतिगत मामले में मंत्रीपरिषद की सलाह संपूर्ण नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी में कहा कि अगर एलजी और मंत्रीपरिषद की सलाह मे मतों का टकराव है तो उसके लिए पर्याप्त कारण होना चाहिए। अगर एलजी मंत्रीपरिषद की सलाह से सहमत नहीं हैं तो मामले को राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं।

सलाह बाध्यकारी नहीं तो बेमतलबः दिल्ली सरकार
गोपाल सुब्रह्मण्यम ने दलील दी कि अगर मंत्रीपरिषद की सलाह एलजी के लिए बाध्यकारी नहीं होगी तो फिर किसी भी फैसले के कोई मायने नहीं रह जाएंगे। कैबिनेट के एग्जिक्युटिव अधिकार को समझना होगा। दिल्ली में चुनी हुई सरकार है और कोर्ट को इसी आलोक में देखना होगा। जो भी केन्द्र शासित प्रदेश है, उसमें एलजी के जरिये राष्ट्रपति प्रशासन देखते हैं। दिल्ली का स्पेशल करैक्टर है और यहां विधानसभा है। यहां चुनी हुई सरकार है और मामला विशेष दर्जे का है। इसके लिए अनुच्छेद-239 एए का उपबंध बनाया गया है, ताकि एक कंट्रोल रह सके। 239 एए एक लोकतांत्रित व्यवस्था देता है।

‘संविधान कानूनी और राजनीतिक दस्तावेज’
सीनियर ऐडवोकेट मंत्री पी. चिदंबरम ने दिल्ली सरकार की ओर से दलीलें पेश की। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के कानूनी और राजनीतिक दस्तावेज है। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच देख रही है और कोई भी व्यवस्था देने से पहले उन्हें लोकतांत्रिक प्रशासन और जनभावनाओं को देखना होगा। चिंदंबरम ने दलील दी कि जहां तक अनुच्छेद 239 एए का सवाल है तो उसे समग्र तौर पर देखना होगा। इसे अकेले नहीं देखा जाना चाहिए। इसे जीएनसीटी के साथ देखना होगा।

जीएनसीटी ऐक्ट की धारा-44 के तहत कहा गया है कि एलजी मंत्रीपरिषद की सिफारिश के तहत काम करेंगे। अगर किसी मामले में वह सहमत नहीं हैं तो वह दोबारा मामले को मंत्रीपरिषद के पास भेज सकते हैं और स्पष्टीकरण मांग सकते हैं। दोबारा अगर सिफारिश आती है और फिर वह वह सहमत नहीं हैं तो मामले को राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं। एलजी किसी भी मामले में मंत्रीपरिषद की सिफारिश से अगर सहमत नहीं हैं तो खुद फैसला नहीं ले सकते या फिर मामले को पेंडिंग नहीं कर सकते। वह स्पष्टीकरण मांग सकते हैं और संतुष्ट नहीं होने पर मामले को राष्ट्रपति के पास भेजेंगे। दिल्ली में दो ही विकल्प है या तो एलजी मंत्रीपरिषद के सलाह से समहत होंगे या फिर असहमति होने पर मामले को राष्ट्रपति के पास भेजेंगे। वह खुद फैसला नहीं ले सकते। एलजी खुद राष्ट्रपति के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकते।



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