RBI के बड़े खुलासे से फंसी मोदी सरकार : नोटबन्दी की घोषणा से चंद घण्टों पहले ही RBI ने मोदी के दावों पर आपत्ति जताते हुए साफ कह दिया था कि ‘नोटबंदी से कालेधन और फेक करेंसी पर कोई असर नहीं होगा।’

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8 नवम्बर 2016 को प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबन्दी की घोषणा करते हुए 500 और 1000 के उच्च मूल्य वाले नोटों को चलन से बाहर कर दिया था। इसके लिए RBI ने मंजूरी तो दे दी थी लेकिन इस पर 6 बड़ी आपत्तियां भी दर्ज करायीं थीं। RBI की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए PM मोदी ने समस्त देश को नोटबन्दी की राष्ट्रीय यातना भुगतने को मजबूर कर दिया था।

इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक 15 दिसंबर, 2016 को आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल ने बैठक के पांच हफ्ते बाद मिनटों पर हस्ताक्षर किए। इस नोट में RBI ने साफ कह दिया था कि नोटबन्दी के लिए मोदी सरकार जिन दो बड़े कारकों ‘कालाधन’ और ‘फेक करेंसी’ को आधार बना रही है, उन पर नोटबन्दी से कोई असर नहीं पड़ने वाला है। इससे ना तो कालाधन खत्म हो सकेगा ना ही फेक करेंसी।

आरबीआई के निदेशकों ने 7 नवम्बर 2016 को मोदी सरकार द्वारा नोटबन्दी स्किम का मसौदा प्राप्त होने के बाद यह तर्क साफ कर दिया था कि 500 और 1000 के उच्च मूल्य वाले नोटों को चलन से बाहर करने का सरकार का फैसला सही नहीं है।

वित्त मंत्रालय द्वारा नोटबन्दी से कालाधन खत्म होगा बताते हुए कालेधन पर भेजे गए व्हाइट पेपर पर RBI बोर्ड ने यह साफ लिखकर दिया था कि देश में अधिकांश काले धन नकद के रूप में नहीं बल्कि असली रूप में होता है क्षेत्र या संपत्ति जैसे सोने या रीयल-एस्टेट, प्रॉपर्टी जबकि नोटबन्दी से इन संपत्तियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा तो नोटबन्दी से कालेधन पर प्रहार की बात बेमानी है।

जाली नोटों के तर्क पर भी RBI बोर्ड ने यह लिखा था कि 500 और 1000 की मात्र 400 करोड़ रुपये की नकली करेंसी का होना अनुमानित है। इतनी छोटी मात्रा की नकली करेंसी के लिए अरबों रुपये के नोटों को चलन से बाहर कर देना ठीक नहीं। इससे जितना फायदा नहीं उससे कई गुना ज्यादा नुकसान होगा। पुराने नोटों को नष्ट करना फिर उनकी जगह नए नोट छापने के खर्चे से बैंकों को बहुत घाटा होगा।

RBI बोर्ड ने यह भी लिखा था कि इस पर विचार किया गया है कि 500-1000 के उच्च मुद्रा नोटों को वापस लेने से विशेष रूप से दो क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है: चिकित्सा और पर्यटन।

इसलिए प्राइवेट मेडिकल स्टोर्स और अस्पतालों को भी नोटबन्दी से छूट देते हुए इसके प्रभाव से बाहर रखना चाहिए ताकि मरीजों को इलाज मिलने में कोई दिक्कत का सामना ना करना पड़े।

आने वाले पर्यटकों की समस्याओं को ध्यान करते हुए आरबीआई के निदेशकों ने लिखा कि: “घरेलू लंबी दूरी के यात्रियों को नुकसान पहुंच सकता है जो केवल उच्च मूल्य वाले नोट ले जा रहे हैं, रेलवे स्टेशनों / हवाई अड्डों पर टैक्सी ड्राइवरों और पोर्टर शुल्कों के भुगतान के लिए आनी वाली कठिनाई से वे हैरान-परेशान होंगे। साथ ही यह पर्यटकों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। ”

उस दिन शाम 5:30 बजे नई दिल्ली में जल्दी से बुलाई गयी भारतीय रिज़र्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड की 561 वीं बैठक के मिनटों से पता चलता है कि केंद्रीय बैंक के निदेशकों ने इस कदम को “प्रशंसनीय” बताया लेकिन इससे देश की GPD को बड़ा नुकसान होगा यह ही बताया था। हालांकि सभी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए मोदी सरकार ने नोटबन्दी का तानाशाही फैसला सुनाते हुए पूरे देश में आपातकाल जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी जिससे हुए नुकसान की भरपाई आजतक नहीं हो पायी है।

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